मत्स्य पुराण की कथा
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मेरी यह पोस्ट मत्स्य पुराण की कथा पर आधारित है, जिसके पन्ने नीचे पोस्ट कर दिए है। , यह किसी को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि पुराण कथा की सच्चाई से अवगत कराने के लिए है। यह मेरे माता पिता के धर्म का भी हिस्सा है।
राम की पत्नी सीता का अपहरण हुआ, लेकिन सीता पवित्र बनी रही। लेकिन मत्स्य पुराण में कथा है कि कृष्ण की 16000 पत्नियों का ना सिर्फ अपहरण हुआ बल्कि बार बार अपहरणकर्ताओं द्वारा संभोग भी किया गया।
ऐसा नारद और स्वय कृष्ण के शाप के कारण हुआ ।
दुखी हुई इन पत्नियों ने ऋषि दाल्भ्य के सामने विलाप किया तब ऋषि दाल्भ्य ने इस शाप से छुटकारे का को उपाय बताया वह भी बड़ा मजेदार है। यह उपाय इन्द्र ने बताया था, ऐसा लिखा गया है।
बताया गया है कि देवो ने देत्यों, असुरों, राक्षसों को जब मार दिया तब उनकी पत्नियों को वेश्यवृती का धंधा दे दिया और धंधे के लिए राजधानी और मन्दिरों में ही स्थान दे दिया ।
इन्द्र ने उन स्त्रियों को इस तरह कहा, "अब तुम वेश्यवृति स्वीकार करो, राजधानी या देवमंदिरों में निवास करें। राजा और राजा के पुत्रों को अपना पति स्वीकार करो। जो भी पैसे देकर आप के साथ संभोग करना चाहे उस का सम्मान करो। दरिद्र का भी सम्मान करो। ब्राह्मणों को गाय, सोना, अन्न वगेरह दान करो।
व्रत के लिए भी बताया जो इस प्रकार है, व्रत वाले दिन ऐसी जड़ी बूटियों से युक्त पानी से नहाना है जिससे सेक्स बड़ जाए। फिर भगवान की मूर्ति के पैर, ऐड़ी, लिंग, कटी प्रदेश से लेकर स्तनों से भी आगे सभी अंगो की क्रमवार पूजा करके ब्राह्मण को खाना खिलाना है और फिर ब्राह्मण को कामदेव समझ कर उसके साथ रती क्रिया करनी है। सोने चांदी की वस्तुएं भेट करनी है और प्रत्येक रविवार को ब्राह्मण घर पर आएगा उसके साथ संभोग करके ही फिर किसी और के साथ संभोग करना है।
मेरी भाषा से अश्लीलता लग सकती है इसलिए पुराण की भाषा में ही लिखता हूं, जिससे आप के मन में शायद श्रद्धा पैदा हो। " उसके बाद जब कोई ब्राह्मण रती के लिए रविवार को घर आए तो उस समय उसकी भी आज्ञा माननी चाहिए, और पर्याप्त आदर करना चाहिए। इस प्रकार 13 महीने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करना चाहिए। उसके जाने के बाद अन्य पुरुषों का सेवन करना चाहिए। ब्राह्मण की आज्ञा से अगर कोई रूपवान पुरुष घर आए उसकी भी अपने कल्याण में अगर कोई विघ्न ना हो सेवा करनी चाहिए। इस तरह दैव तथा मानव का यह अति प्रिय कर्म जो गर्भ की संभूति करने वाला है अनुरागपूर्वक करते हुए 58 बार यह व्रत करें।
दोबारा लिख रहा हूं कि इन्द्र ने इन दानवों, असुरों, दैत्यों को पत्नियों को क्या कहा, " इस तरह दैव और मानवों का यह अति प्रिय कर्म ( संभोग) को गर्भ की संभूति करने वाला है, अनुरागपुरवक 58 बार ( 58 सप्ताह ) करें। यानी ब्राह्मणों को संतुष्ट करती रहें।
अगले जनम में कैसे अच्छे कुल में जन्म लेगी यही रास्ता दाल्भ्य ऋषि ने कृष्ण की 16000 रानियों को बताया।
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